रियासतों के दौर से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक, लखीमपुर खीरी की राजनीति ने कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं।
प्रमुख रियासतें: स्वतंत्रता से पहले ओयल, सिंगाही, ईसानगर और बरवर जैसी रियासतें राजनीतिक शक्ति का केंद्र थीं।
प्रशासनिक परिवर्तन: 1856 में क्षेत्र को मोहम्मदी (पश्चिम) और मल्लानपुर (पूर्व) में विभाजित किया गया। 1858 के बाद लखीमपुर को जिला मुख्यालय बनाया गया।
1957 लोकसभा चुनाव: खीरी लोकसभा सीट का पहला चुनाव 1957 में हुआ, जिसे प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के कुशवक्त राय ने जीता।
वर्मा परिवार का प्रभाव: बलगोविंद वर्मा (कांग्रेस) तीन बार सांसद रहे। उनके बाद रवि प्रकाश वर्मा (सपा) 1998 से 2004 तक लगातार तीन बार सांसद चुने गए।
धौरहरा सीट: 2008 परिसीमन के बाद धौरहरा अलग लोकसभा क्षेत्र बना। 2009 में जितिन प्रसाद यहां से सांसद बने।
प्रमुख रियासती घराने: ओयल, सिंगाही, ईसानगर और मितौली राजनीतिक निर्णयों के केंद्र थे।
राजा लोन सिंह: मितौली के राजा लोन सिंह ने 1857 की प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल फूंका।
दो लोकसभा सीटें: खीरी और धौरहरा।
8 विधानसभा सीटें: मोहम्मदी, गोला गोकर्णनाथ, कस्ता, लखीमपुर, श्रीनगर, निघासन, धौरहरा और पलिया कलां।
गन्ना बेल्ट की राजनीति: लखीमपुर खीरी को “शुगर बाउल” कहा जाता है। यहाँ राजनीति मुख्यतः गन्ना किसानों के मुद्दों, भुगतान और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर केंद्रित रहती है।
जातीय समीकरण: ब्राह्मण, कुर्मी (वर्मा), मुस्लिम और सिख मतदाता चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
तिकुनिया हिंसा (2021): कृषि कानूनों के विरोध के दौरान 3 अक्टूबर 2021 को हुई घटना ने क्षेत्र की राजनीति को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया।
2022 विधानसभा चुनाव: किसानों के आंदोलन के बावजूद भाजपा ने जिले की सभी 8 सीटों पर जीत दर्ज की।
2024 लोकसभा चुनाव: सपा के उत्कर्ष वर्मा ने खीरी सीट जीती, जबकि भाजपा नेता अजय मिश्रा 'टेनी' को हार का सामना करना पड़ा।