लखीमपुर खीरी प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक आस्था और स्वतंत्रता संग्राम के गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है। नीचे जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है।
दुधवा राष्ट्रीय उद्यान उत्तर प्रदेश का एकमात्र राष्ट्रीय उद्यान है, जो भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है। यह “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” योजना के अंतर्गत विशेष पहचान रखता है।
विशेष आकर्षण: बाघ, एक सींग वाला गैंडा, बारहसिंगा (स्वैम्प डियर), हाथी तथा अनेक दुर्लभ पक्षी प्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं।
सफारी सीजन 2026: इस वर्ष विशेष 'सफारी सीजन 2026' के अंतर्गत थारू संस्कृति अनुभव, होमस्टे सुविधा तथा योग एवं ध्यान जैसी वेलनेस गतिविधियाँ आयोजित की जा रही हैं।
किशनपुर वन्यजीव अभयारण्य: यह दुधवा टाइगर रिजर्व का हिस्सा है और बाघों को देखने के लिए उत्कृष्ट स्थान माना जाता है।
यह मंदिर ओयल कस्बे में स्थित है और अपनी अद्भुत वास्तुकला के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है।
विशेषता: यह भारत का एकमात्र मंदिर है जो "मांडूक तंत्र" पर आधारित है और एक विशाल मेंढक की पीठ पर निर्मित है।
रहस्य: यहाँ स्थापित शिवलिंग दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था और आश्चर्य का विषय है।
गोला गोकर्णनाथ को "छोटी काशी" के नाम से जाना जाता है। यहाँ स्थित प्राचीन शिव मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है और सावन माह में लाखों श्रद्धालु यहाँ जलाभिषेक करने आते हैं।
यह स्थान धार्मिक आस्था का प्रमुख केंद्र है और यहाँ प्रतिवर्ष विशाल मेला भी आयोजित किया जाता है।
यह गुरुद्वारा घाघरा नदी के तट पर स्थित है और सिख समुदाय के लिए अत्यंत पवित्र स्थल है।
इतिहास: मान्यता है कि प्रथम सिख गुरु, गुरु नानक देव जी, वर्ष 1514 में यहाँ पधारे थे।
धार्मिक महत्व: कहा जाता है कि गुरु जी ने यहाँ अपने वचनों की शक्ति से एक कुष्ठ रोगी को ठीक किया था।
नसीरुद्दीन मेमोरियल हॉल (पूर्व नाम – विलॉबी हॉल) का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 26 अगस्त 1920 को खिलाफत आंदोलन से प्रेरित क्रांतिकारियों – नसीरुद्दीन 'मौजी', बशीरुद्दीन और मासूम अली – ने तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर आर.डब्ल्यू.डी. विलॉबी की हत्या की थी।
निर्माण: इस घटना के बाद 1924 में अंग्रेजों द्वारा विलॉबी मेमोरियल हॉल का निर्माण कराया गया।
पुनः नामकरण: वर्ष 1997 में जिला प्रशासन द्वारा इसका नाम बदलकर नसीरुद्दीन मेमोरियल हॉल रखा गया।
मितौली के राजा लोन सिंह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के वीर योद्धा थे। उनकी गढ़ी (किला) विद्रोह का प्रमुख केंद्र थी।
स्थान: यह किला मितौली तहसील में स्थित था और घने जंगलों से घिरा एक अभेद्य दुर्ग माना जाता था।
1857 में भूमिका: राजा लोन सिंह ने बेगम हजरत महल के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध का नेतृत्व किया।
विनाश: 1858 में अंग्रेजी सेना ने किले को तोपों से ध्वस्त कर दिया ताकि वह भविष्य में विद्रोह का केंद्र न बन सके।
वर्तमान स्थिति: आज केवल अवशेष शेष हैं, किंतु स्थानीय लोग इस स्थान को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर एवं पवित्र सरोवर भी स्थित है।